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	<description>Indian Vedic Astrology Blog</description>
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		<title>मंगल केतु में समनता एवं विभेद (Similarities and differences between Mars and Ketu)</title>
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		<pubDate>Mon, 30 Aug 2010 00:12:23 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Acharya Shashikant</dc:creator>
				<category><![CDATA[Feature]]></category>
		<category><![CDATA[Vedic Astrology]]></category>

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		<description><![CDATA[मंगल को नवग्रहों में तीसरा स्थान प्राप्त है और केतु को नवम स्थान फिर भी ज्योतिष की पुस्तकों में कई स्थान पर लिखा मिलता है कि मंगल एवं केतु समान फल देने वाले ग्रह हैं (It is said in many jyotish books that Mars and Ketu give similar results). ज्योतिषशास्त्र में मंगल एवं केतु को [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" rel="attachment wp-att-265" href="http://jyotirveda.com/?attachment_id=265"><img class="alignleft size-thumbnail wp-image-265" title="mars-venus" src="http://jyotirveda.com/wp-content/uploads/mars-venus-245x135.jpg" alt="" width="245" height="135" /></a>मंगल को नवग्रहों में तीसरा स्थान प्राप्त है और केतु को नवम स्थान फिर भी ज्योतिष की पुस्तकों में कई स्थान पर लिखा मिलता है कि मंगल एवं केतु समान फल देने वाले ग्रह हैं (It is said in many jyotish books that Mars and Ketu give similar results). ज्योतिषशास्त्र में मंगल एवं केतु को राहु एवं शनि के समान ही पाप ग्रह कहा जाता है. मंगल एवं केतु दोनों ही उग्र एवं क्रोधी स्वभाव के माने जाते हैं. इनकी प्रकृति अग्नि प्रधान होती है. मंगल एवं केतु एक प्रकृति होने के बावजूद इनमें काफी कुछ अंतर हैं एवं कई विषयों में मंगल केतु एक समान प्रतीत होते हैं.</p>
<p><strong>मंगल एवं केतु में समानता (Similarities between Mars and Ketu)</strong><br />
मंगल व केतु दोनों ही जोशीले ग्रह हैं. लेकिन, इनका जोश अधिक समय तक नहीं रहता है. दूध की उबाल की तरह इनका इनका जोश जितनी चल्दी आसमान छूने लगता है उतनी ही जल्दी वह ठंढ़ा भी हो जाता है. इसलिए, इनसे प्रभावित व्यक्ति अधिक समय तक किसी मुद्दे पर डटे नहीं रहते हैं, जल्दी ही उनके अंदर का उत्साह कम हो जाता है और मुद्दे से हट जाते हैं (People influenced by Mars and Ketu get excited quickly, but also lose the excitement fast). मंगल एवं केतु का यह गुण है कि इन्हें सत्ता सुख काफी पसंद होता है. ये राजनीति में एवं सरकारी मामलों में काफी उन्नति करते हैं. शासित होने की बजाय शासन करना इन्हें रूचिकर लगता है. मंगल एवं केतु दोनों को कष्टकारी, हिंसक, एवं कठोर हृदय वाला गह कहा जाता है. परंतु, ये दोनों ही ग्रह जब देने पर आते हैं तो उदारता की पराकष्ठा दिखाने लगते हैं यानी मान-सम्मान, धन-दौलत से घर भर देते हैं.</p>
<p><strong>मंगल केतु में विभेद (Differences between Mars and Ketu)</strong><br />
मंगल केतु में शनि एवं राहु के समान भौतिक एवं अभौतिक का विभेद है अर्थात मंगल सौर मंडल में एक भौतिक पिण्ड के रूप में मौजूद है जबकि केतु चन्द्र के क्रांतिपथ का वह आभाषीय बिन्दु हैं जहां चन्द्र पृथ्वी के पथ को काटकर दक्षिण की तरफ आगे बढ़ता है. मंगल के दो ग्रह हैं मेष एवं वृश्चिक जबकि केतु की अपनी राशि नहीं है. केतु भी राहु की तरह उस राशि पर अधिकार कर लेता है जिस राशि में वह वर्तमान होता है.<br />
मंगल अपने प्रराक्रम के कारण जब किसी के लिए कुछ करने पर आता है तो उसके लिए प्राण न्यौछावर करने के लिए तैयार रहता है. परंतु, इसके पराक्रम का दूसरा पहलू यह है कि अगर यह दुश्मनी करने पर आ जाए तो प्राण लेने से भी पीछे नहीं हटता है. केतु की भी इसी तरह की विशेषता है कि जब यह त्याग करने पर आता है तो साधुवाद धारण कर लेता है. राजसी सुख-वैभव का त्याग करने में भी इसे वक्त नहीं लगता लेकिन, जब पाने की इच्छा होती है तो अपनी चतुराई एवं कुटनीति से झोपड़ी को भी महल में बदल डालता है.</p>
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		<title>Bhadrapada Sankranti &#8211; भाद्रपद संक्रान्ति 2010</title>
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		<pubDate>Wed, 25 Aug 2010 13:50:57 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Acharya Shashikant</dc:creator>
				<category><![CDATA[Muhurta]]></category>

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		<description><![CDATA[17 अगस्त 2010, मंगलवार, प्रात: 05:43, सूर्य मघा नक्षत्र, सिंह राशि में प्रवेश करेगा. इस संक्रान्ति में किये जाने वाले कार्यो का शुभ समय दोपहर 11:58 तक रहेगा. भाद्रपद संक्रान्ति को ध्वांक्षी संक्रान्ति के नाम से भी जाना जाता है. भाद्रपद संक्रान्ति व्यापारिक वर्ग के लिये विशेष रहेगी. इस संक्रान्ति में व्यापारिक वर्ग को लाभ [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" rel="attachment wp-att-259" href="http://jyotirveda.com/?attachment_id=259"><img class="alignleft size-thumbnail wp-image-259" title="bhadrapada-sankranti" src="http://jyotirveda.com/wp-content/uploads/bhadrapada-sankranti-245x135.jpg" alt="" width="245" height="135" /></a>17 अगस्त 2010, मंगलवार, प्रात: 05:43, सूर्य मघा नक्षत्र, सिंह राशि में प्रवेश करेगा. इस संक्रान्ति में किये जाने वाले कार्यो का शुभ समय दोपहर 11:58 तक रहेगा. भाद्रपद संक्रान्ति को ध्वांक्षी संक्रान्ति के नाम से भी जाना जाता है. भाद्रपद संक्रान्ति व्यापारिक वर्ग के लिये विशेष रहेगी. इस संक्रान्ति में व्यापारिक वर्ग को लाभ व सुख दोनों की प्राप्ति होने की संभावनाएं रहेगी.</p>
<p>भाद्रपद माह का महत्व इस माह में आने वाले शुभ महोत्सवों के कारण सदैव से विशेष रहा है:-</p>
<p><strong> Kajari Teej &#8211; Kajjali Teej कज्जली तीज:- 27 अगस्त 2010</strong><br />
भाद्रपद कृष्ण तृ्तीय तीथि (इस वर्ष इस तिथि का क्षय रहेगा.) अर्थात 27 अगस्त 2010, शुक्रवार, उतरभाद्रपद नक्षत्र, चन्द्र मीन राशि में, भद्रा 16:31 तक रहेगी. 27 अगस्त 2010 में बड़ी तीज का पर्व मनाया जाता है. इस तीज को कज्जली तीज के नाम से भी जाना जाता है. इस त्यौहार को राजस्थान के कई क्षेत्रों में विशेष रुप से मनाया जाता है.<span id="more-253"></span></p>
<p>यह माना जाता है कि इस पर्व का आरम्भ महाराणा राजसिंह ने अपनी रानी को प्रसन्न करने के लिये आरम्भ किया था. यह त्यौहार दो माह में मनाया जाता है. श्रवण मास कि शुक्ल पक्ष की तृ्तीया को छोटी तीज व भाद्रपद की तृ्तीया को बडी तीज अर्थात कज्जली तीज का पर्व मनाया जाता है.</p>
<p><strong>Shree Krishna Janmashtami &#8211; श्रीकृ्ष्ण जन्माष्टमी:- 1 सितम्बर 2010</strong><br />
भाद्रपद मास में आने वाला अगला पर्व कृष्ण अष्टमी के नाम से जाना जाता है. यह उपवास पर्व उतरी भारत में विशेष महत्व रखता है. श्री कृ्ष्ण जन्माष्टमी प्रात: 10:50 से अगले दिन प्रात: 10:42 तक रहेगी. इस अवधि में कृ्ष्ण पूजा, कीर्तन, उपवास व मंदिरों में धूमधाम का माहौल रहेगा.</p>
<p><strong>Vatsa Dwadashi &#8211; वत्सद्वादशी पर्व:- 05 सितम्बर, 2010</strong><br />
वर्तमान में यह पर्व मात्र राजस्थान के कुछ क्षेत्रों में ही देखने में आता है. समय की धूल ने इस पर्व के उल्लास को ढक दिया है. यह पर्व भाद्रपद माह, कृ्ष्ण पक्ष की द्वादशी को मनाया जाता है. वत्सद्वाद्शी में परिवार की महिलाएं गाय व बछडे का पूजन करती है. इसके पश्चात माताएं गऊ व गाय के बच्चे की पूजा करने के बाद अपने बच्चों को प्रसाद के रुप में सूखा नारियल देती है. यह पर्व विशेष रुप से माता का अपने बच्चों कि सुख-शान्ति से जुडा हुआ है.</p>
<p><strong>Ganesh Chaturthi &#8211; गणेश चतुर्थी / सिद्धि विनायक व्रत :- 11 सितम्बर 2010</strong><br />
भाद्रपद माह, शुक्ल पक्ष,  की चतुर्थ तिथि को गणेश चतुर्थी मनाई जाती है. इस वर्ष यह 11 सितम्बर 2010 को मनाया जायेगा. इस दिन भगवान श्री गणेश की पूजा, उपवास व आराधना का शुभ कार्य किया जाता है. पूरे दिन उपवास रख श्री गणेश को लड्डूओं का भोग लगाया जाता है. प्राचीन काल में इस दिन लड्डूओं की वर्षा की जाती थी, जिसे लोग प्रसाद के रुप में लूट कर खाया जाता था. गणेश मंदिरों में इस दिन विशेष धूमधाम रहती है.</p>
<p>गणेश चतुर्थी को चन्द्र दर्शन नहीं करने चाहिए. विशेष कर इस दिन उपवास रखने वाले उपासकों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए. अन्यथा उपवास का पुन्य प्राप्त नहीं होता है.</p>
<p><strong>Dev Jhoolni Ekadashi &#8211; देवझूलनी एकादशी:- 18 सितम्बर 2010</strong><br />
देवझूलनी एकादशी को पदमा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है. भाद्रपद माह, शुक्ल पक्ष, एकादशी तिथि, शनिवार, उतरा आषाढा नक्षत्र में यह उत्सव मनाया जाता है. देवझूलनी एकादशी में विष्णु जी की पूजा, व्रत, उपासना करने का विधान है.</p>
<p>इस दिन विष्णु देव की पाषाण की प्रतिमा अथवा चित्र को पालकी में ले जाकर जलाशय से स्थान करना शुभ माना जाता है. इस उत्सव में नगर के निवासि विष्णु गान करते हुए पालकी के पीछे चल रहे होते है. उत्सव में भाग लेने वाले सभी लोग इस दिन उपवास रखते है.</p>
<p><strong>Anant Chaturdashi -  अनन्त चतुर्थेदशी :- 22 सितम्बर 2010</strong><br />
भाद्रपद माह में आने वाले पर्वों की श्रंखला में अगला पर्व अनन्त चतुर्दशी के नाम से प्रसिद्ध है. 22 सितम्बर 2010,  चतुर्दशी तिथि, शुक्ल पक्ष, बुधवार, पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र में यह उपवास पर्व इस वर्ष मनाया जायेगा.  इस पर्व में दिन में एक बार भोजन किया जाता है.</p>
<p>यह पर्व भगवान विष्णु के अनन्त स्वरुप पर आधारित है. इस दिन &#8220;ऊँ अनन्ताय नम:&#8217; का जाप करने से विष्णु जी प्रसन्न होते है.</p>
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		<title>विवाह के उपाय  (Remedies and Upay to avoide late marriage)</title>
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		<pubDate>Wed, 07 Jul 2010 22:53:28 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Acharya Shashikant</dc:creator>
				<category><![CDATA[Remedies]]></category>

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		<description><![CDATA[समय पर अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने की इच्छा के कारण माता-पिता व भावी वर-वधू भी चाहते है कि अनुकुल समय पर ही विवाह हो जायें. कुण्डली में विवाह विलम्ब से होने के योग होने पर विवाह की बात बार-बार प्रयास करने पर भी कहीं बनती नहीं है. इस प्रकार की स्थिति होने पर शीघ्र [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>समय पर अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने की इच्छा के कारण माता-पिता व भावी वर-वधू भी चाहते है कि अनुकुल समय पर ही विवाह हो जायें. कुण्डली में विवाह विलम्ब से होने के योग होने पर विवाह की बात बार-बार प्रयास करने पर भी कहीं बनती नहीं है. इस प्रकार की स्थिति होने पर शीघ्र विवाह के उपाय करने हितकारी रहते है. उपाय करने से शीघ्र विवाह के मार्ग बनते है. तथा विवाह के मार्ग की बाधाएं दूर होती है.</p>
<p><strong>उपाय करते समय ध्यान में रखने योग्य बातें (Precautions while doing Jyotish remedies)</strong></p>
<ul>
<li> 1. किसी भी उपाय को करते समय, व्यक्ति के मन में यही विचार होना चाहिए, कि वह जो भी उपाय कर रहा है, वह ईश्वरीय कृ्पा से अवश्य ही शुभ फल देगा.</li>
<li>2. सभी उपाय पूर्णत: सात्विक है तथा इनसे किसी के अहित करने का विचार नहीं है.</li>
<li>3. उपाय करते समय उपाय पर होने वाले व्ययों को लेकर चिन्तित नहीं होना चाहिए.</li>
<li>4. उपाय से संबन्धित गोपनीयता रखना हितकारी होता है.</li>
<li>5. यह मान कर चलना चाहिए, कि श्रद्धा व विश्वास से सभी कामनाएं पूर्ण होती है.</li>
</ul>
<p>आईये शीघ्र विवाह के उपायों को समझने का प्रयास करें (Remedies for a late marriage)</p>
<p><strong>1. हल्दी के प्रयोग से उपाय</strong><br />
विवाह योग लोगों को शीघ्र विवाह के लिये प्रत्येक गुरुवार को नहाने वाले पानी में एक चुटकी हल्दी डालकर स्नान करना चाहिए. भोजन में केसर का सेवन करने से विवाह शीघ्र होने की संभावनाएं बनती है.</p>
<p><strong>2. पीला वस्त्र धारण करना</strong><br />
ऎसे व्यक्ति को सदैव शरीर पर कोई भी एक पीला वस्त्र धारण करके रखना चाहिए.</p>
<p><strong>3. वृ्द्धो का सम्मान करना</strong><br />
उपाय करने वाले व्यक्ति को कभी भी अपने से बडों व वृ्द्धों का अपमान नहीं करना चाहिए.</p>
<p><strong>4. गाय को रोटी देना</strong><br />
जिन व्यक्तियों को शीघ्र विवाह की कामना हों उन्हें गुरुवार को गाय को दो आटे के पेडे पर थोडी हल्दी लगाकर खिलाना चाहिए. तथा इसके साथ ही थोडा सा गुड व चने की पीली दाल का भोग गाय को लगाना शुभ होता है.</p>
<p><strong>5. शीघ्र विवाह प्रयोग</strong><br />
इसके अलावा शीघ्र विवाह के लिये एक प्रयोग भी किया जा सकता है. यह प्रयोग शुक्ल पक्ष के प्रथम गुरुवार को किया जाता है. इस प्रयोग में गुरुवार की शाम को पांच प्रकार की मिठाई, हरी ईलायची का जोडा तथा शुद्ध घी के दीपक के साथ जल अर्पित करना चाहिये. यह प्रयोग लगातार तीन गुरुवार को करना चाहिए.</p>
<p><strong>6. केले के वृ्क्ष की पूजा</strong><br />
गुरुवार को केले के वृ्क्ष के सामने गुरु के 108 नामों का उच्चारण करने के साथ शुद्ध घी का दीपक जलाना चाहिए. अथा जल भी अर्पित करना चाहिए.</p>
<p><strong>7. सूखे नारियल से उपाय</strong><br />
एक अन्य उपाय के रुप में सोमवार की रात्रि के 12 बजे के बाद कुछ भी ग्रहण नहीं किया जाता, इस उपाय के लिये जल भी ग्रहण नहीं किया जाता. इस उपाय को करने के लिये अगले दिन मंगलवार को प्रात: सूर्योदय काल में एक सूखा नारियल लें,  सूखे नारियल में चाकू की सहायता से एक इंच लम्बा छेद किया जाता है. अब इस छेद में 300 ग्राम बूरा (चीनी पाऊडर)  तथा 11 रुपये का पंचमेवा मिलाकर नारियल को भर दिया जाता है.</p>
<p>यह कार्य करने के बाद इस नारियल को पीपल के पेड के नीचे गड्डा करके दबा देना. इसके बाद गड्डे को मिट्टी से भर देना है. तथा कोई पत्थर भी उसके ऊपर रख देना चाहिए.</p>
<p>यह क्रिया लगातार 7 मंगलवार करने से व्यक्ति को लाभ प्राप्त होता है.  यह ध्यान रखना है कि सोमवार की रात 12 बजे के बाद कुछ भी ग्रहण नहीं करना है.</p>
<p><strong>8. मांगलिक योग का उपाय (Remedies for Manglik Yoga)</strong><br />
अगर किसी का विवाह कुण्डली के मांगलिक योग के कारण नहीं हो पा रहा है, तो ऎसे व्यक्ति को मंगल वार के दिन चण्डिका स्तोत्र का पाठ मंगलवार के दिन तथा शनिवार के दिन सुन्दर काण्ड का पाठ करना चाहिए. इससे भी विवाह के मार्ग की बाधाओं में कमी होती है.</p>
<p><strong>9. छुआरे सिरहाने रख कर सोना</strong><br />
यह उपाय उन व्यक्तियों को करना चाहिए. जिन व्यक्तियों की विवाह की आयु हो चुकी है. परन्तु विवाह संपन्न होने में बाधा आ रही है. इस उपाय को करने के लिये शुक्रवार की रात्रि में आठ छुआरे जल में उबाल कर जल के साथ ही अपने सोने वाले स्थान पर सिरहाने रख कर सोयें तथा शनिवार को प्रात: स्नान करने के बाद किसी भी बहते जल में इन्हें प्रवाहित कर दें.</p>
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		<title>प्रश्न कुण्डली से पूछिये प्रेम में सफलता मिलेगीं या नहीं  (Will I have Love Marriage)</title>
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		<pubDate>Fri, 02 Jul 2010 01:15:09 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Acharya Shashikant</dc:creator>
				<category><![CDATA[Horary]]></category>
		<category><![CDATA[Marriage Astrology]]></category>
		<category><![CDATA[Love Marriage]]></category>

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		<description><![CDATA[प्यार की मंजिल प्रेमी को पाना होता है. हर प्रेमी की चाहत होती है कि वह जिससे प्यार करता है वही उसका जीवनसाथी बने. लेकिन बहुत कम लोग होते हैं जिनका प्यार सफल हो पाता है. जिन लोगों के मन में यह भावना उठती हो कि उनका प्यार सफल होग या नहीं वह प्रश्न कुण्डली [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" rel="attachment wp-att-220" href="http://jyotirveda.com/?attachment_id=220"><img class="alignleft size-thumbnail wp-image-220" title="prashna-jyotish-love" src="http://jyotirveda.com/wp-content/uploads/prashna-jyotish-love-245x135.jpg" alt="" width="245" height="135" /></a>प्यार की मंजिल प्रेमी को पाना होता है. हर प्रेमी की चाहत होती है कि वह जिससे प्यार करता है वही उसका जीवनसाथी बने. लेकिन बहुत कम लोग होते हैं जिनका प्यार सफल हो पाता है. जिन लोगों के मन में यह भावना उठती हो कि उनका प्यार सफल होग या नहीं वह प्रश्न कुण्डली से अपना सवाल पूछ सकते हैं.</p>
<p><strong>प्रेम विवाह के लिए ग्रह स्थिति (Astrological combinations for love marriage)</strong><br />
कुण्डली में जब प्रेम विवाह के विषय में ग्रह स्थिति का विचार किया जाता है तब पांचवें, सातवें और ग्यारहवे भाव तथा इस भाव के स्वामी की स्थिति को भी देखा जाता है. कुण्डली में गुरू की स्थिति से प्रेम का विचार किया जाता है (Jupiter is analysed to predict love) जबकि शु्क्र से प्रेम विवाह को देखा जाता है. कुण्डली में पंचम भाव अथवा पंचमेश, सप्तम भाव सप्तमेश और लग्न एवं लग्नेश प्रेम विवाह को सफल बनाते हैं. कुण्डली में अगर ये भाव और भाव स्वामी कमजोर अथवा पीड़ित हों तो प्रेम विवाह में बाधाओं का सामना करना होता है.</p>
<p><strong>प्रश्न कुण्डली में प्रेम विवाह की स्थिति देखें (Love marriage in prashna kundali)</strong><br />
प्रश्न कुण्डली जब प्रेम विवाह के विषय मे पूछा जाता है तब कुण्डली में अगर पंचम भाव का स्वामी, सप्तम का स्वामी, एकादश का स्वामी अपनी राशि में बैठा हो तो इसे प्रेम विवाह सफलता पूर्वक होने का सूचक समझना चाहिए (If eleventh lord is in its sign it suggests love marriage). पंचम भाव का स्वामी अगर सप्तमेश के साथ कुण्डली के किसी भाव में बैठा हो और ग्यारहवें भाव का स्वामी इस युति को देखता है तो इसे भी प्रेम विवाह का संकेत कहा जा सकता है. पंचम का स्वामी अगर सातवें घर में बैठा हो और सातवें का स्वामी पंचवें घर में बैठा हो और पांचवें अथवा सातवें घर पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो विशेषकर ग्यारहवें भाव के स्वामी की दृष्टि हो तो प्रेम विवाह संभावना प्रबल बनती है.</p>
<p><strong>प्रश्न कुण्डली से प्रेम विवाह की कुण्डली का उदाहरण (Example of love marriage from Prashna Kundali)</strong><br />
प्रवेश और सोनिया साथ काम करते हैं और एक दूसरे को पसंद करते हैं. प्रवेश ने जब अपने घर में सोनिया से शादी की बात की तो घर के लोग ने विरोध जताया. इस स्थिति में प्रवेश को लगने लगा कि उनकी शादी सोनिया से नहीं हो पाएगी. प्रवेश ने 27 मई 2009 को शाम के 5 बजकर 38 मिनट पर प्रश्न कुण्डली से सवाल किया कि क्या प्रेम विवाह संभव है. प्रश्न की कुण्डली में लग्न तुला आया जिसका स्वामी शुक्र है. राशि है मिथुन जिसका स्वामी है शुक्र. नक्षत्र है पुनर्वसु जिसका स्वामी गुरू है (Lord of Punarvasu is Jupiter). कुण्डली में प्रेम का कारक गुरू पंचम भाव में बैठा है जो नक्षत्र का भी स्वामी है. लग्नेश शुक्र गुरू की राशि में बैठा है जिससे प्रेम विवाह में काफी विरोध का सामना करना पड़ सकता है. ग्यारहवें भाव में शनि की उपस्थिति सिंह राशि में होना भी कठिनाईयों का संकेत है. फिर भी इस बात की प्रबल संभावना है कि प्रवेश का प्रेम सफल होगा. प्रवेश सोनिया को जीवनसाथी के रूप में प्राप्त कर सकेंगे क्योंकि सप्तमेश मंगल बुध के स्वराशि मेष में बैठा है.</p>
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		<title>समय और ग्रहों के अनुकूल रत्न धारण (Wearing Lucky Gemstone according to Planets and Dasha)</title>
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		<pubDate>Thu, 10 Jun 2010 00:29:19 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Acharya Shashikant</dc:creator>
				<category><![CDATA[Gemstone]]></category>
		<category><![CDATA[lucky gemstones]]></category>

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		<description><![CDATA[रत्न में करिश्माई शक्तियां होती है.रत्न अगर सही समय में और ग्रहों की सही स्थिति को देखकर धारण किये जाएं तो इनका सकारात्मक प्रभाव प्राप्त होता है अन्यथा रत्न विपरीत प्रभाव भी देते हैं.ग्रहों के समान रत्नों में भी आपसी विद्वेष होता है अत: किसी रत्न के साथ दूसरे रत्नों को धारण कर सकते हैं यह भी जानना आवश्यक होता है.]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img src="http://jyotirveda.com/wp-content/uploads/planet-and-gemstone-245x135.jpg" alt="" title="planet-and-gemstone" width="245" height="135" class="alignleft size-thumbnail wp-image-204" /></a>रत्न में करिश्माई शक्तियां होती है.रत्न अगर सही समय में और ग्रहों की सही स्थिति को देखकर धारण किये जाएं तो इनका सकारात्मक प्रभाव प्राप्त होता है अन्यथा रत्न विपरीत प्रभाव भी देते हैं.ग्रहों के समान रत्नों में भी आपसी विद्वेष होता है अत: किसी रत्न के साथ दूसरे रत्नों को धारण कर सकते हैं यह भी जानना आवश्यक होता है.</p>
<h3>सूर्य रत्न माणिक्य (Sun&#8217;s Gemstone Ruby)</h3>
<p>माणिक्य ग्रहों में राजा सूर्य का रत्न होता है (Ruby is the gemstone of Sun).अगर आपकी कुण्डली मे सूर्य किसी भाव में शुभ स्थिति में विराजमान है तो उस भाव की शुभता एवं सूर्य के प्रभाव को बढ़ाने के लिए माणिक्य धारण करना चाहिए.अगर सूर्य शुभ नही हो तो माणिक्य धारण करने से सकारात्मक प्रभाव नहीं मिल पाता है.ज्योतिषशास्त्र के अनुसार सूर्य अगर तृतीय, छठे अथवा ग्यारहवें भाव में हो तो माणिक्य धारण करना चाहिए.लग्न स्थान में सूर्य की स्थिति (Sun placed in the ascendant) होने पर लग्न बलवान बनाने के लिए सूर्य का रत्न पहनना चाहिए.अष्टम भाव में सूर्य की स्थिति होने पर रूबी अर्थात माणिक्य धारण करना पारिवारिक एवं वैवाहिक जीवन के लिए सुखकर होता है.इसी प्रकार सूर्य पंचम अथवा नवम में होने पर भी इस रत्न को पहनने से सकारात्मक प्रभाव प्राप्त होता है.</p>
<h3>चन्द्र रत्न मोती (Moon&#8217;s Gemstone Pearl)</h3>
<p>ग्रहों में रानी चन्द्रमा का रत्न मोती  (Pearl is the gemstone of Moon). है.ज्योतिषीय विधा के अनुसार कुण्डली में चन्द्रमा शुभ भावों में बैठा हो तभी मोती पहनना चाहिए इससे चन्द्रमा उत्तम फल देता है.मोती धारण करने के संदर्भ में ज्योतिषशास्त्र कहता है कि अगर कुण्डली में चन्द्रमा द्वितीय भाव का स्वामी (when Moon is the 2nd lord) हो तो इस रत्न को धारण करना चाहिए.इसी प्रकार पंचमेश होकर द्वादश भाव में स्थित हो तो मोती पहनना चाहिए.वृश्चिक राशि वालों की कुण्डली (Kundali of Scorpio Moonsign) में चन्द्रमा किसी भी भाव में हो मोती धारण करना लाभप्रद होता है.जिस व्यक्ति की कुण्डली में चन्द्रमा पर पाप ग्रह राहु केतु अथवा मंगल की दृष्टि हो उनके लिए मोती बहुत ही लाभप्रद होता है.चन्द्रमा की अन्तर्दशा में चन्द्र रत्न मोती धारण करना शुभ होता है.</p>
<h3>मंगल रत्न मूंगा (Mars&#8217;s Gemstone Coral)</h3>
<p>ग्रहों के सेनापति मंगल का रत्न मूंगा  (Coral is the gemstone of Mars). है.इस रत्न को तब धारण करना चाहिए जबकि कुण्डली में मंगल शुभ भाव का स्वामी हो कर स्थित हो.इस स्थिति में मंगल की शुभता में वृद्धि होती है और व्यक्ति को लाभ मिलता है.अगर मंगल कुण्डली में अस्त अथवा पीड़ित हो (When mars is combust or afflicted) तब भी मूंगा धारण करना शुभ होता है.मंगल की इस दशा मे मूंगा धारण करने से इसके अशुभ प्रभाव में कमी आती है।</p>
<h3>बुध का रत्न पन्ना (Mercury&#8217;s Gemstone Emerald)</h3>
<p>ग्रहों में राजकुमार बुध का रंग हरा  (Emerald is the lucky gemstone of Mercury). है और इनके रत्न का रंग भी हरा है.बुध का रत्न है पन्ना.बुध बुद्धि का स्वामी.इस ग्रह का रत्न तब धारण करना चाहिए जब कुण्डली में बुध शुभ भाव का स्वामी हो.अगर बुध अशुभ स्थिति में हो तो इसका रत्न धारण करने से इसके अशुभ प्रभाव में और वृद्धि होती है.</p>
<p>ध्यान रखने योग्य तथ्य यह है कि, रत्न उस समय धारण करना विशेष लाभप्रद होता है जब सम्बन्धित ग्रह की दशा चल रही होती है.</p>
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		<title>जैमिनी ज्योतिष से विवाह का विचार Determination of Marriage Prospects as per Jaimini Astrology</title>
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		<pubDate>Wed, 09 Jun 2010 01:06:26 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Acharya Shashikant</dc:creator>
				<category><![CDATA[Jaimini Jyotish]]></category>
		<category><![CDATA[Marriage Astrology]]></category>
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		<description><![CDATA[जैमिनी ज्योतिष (Jaimini Jyotish) में विवाह के विचार के लिए उपपद को एक महत्वपूर्ण कारक के रुप में देखा जाता है. उपपद और दाराकारक (Uppad and Dara Karak) से दूसरे एवं सातवें घर एवं उनके स्वामियों का भी विवाह के संदर्भ में विचार किया जाता है. इस विषय में कहा गया है कि अगर दूसरे घर में कोई ग्रह शुभ होकर स्थित हो व उसकी प्रधानता हो अथवा गुरु (Jupiter Karkamsa) और चन्द्रमा कारकांश (Moon Karkamsa) से सातवें घर में स्थित हो तो सुन्दर जीवनसाथी प्राप्त होता है. अगर दूसरे घर में कोई ग्रह अशुभ होकर स्थित हो तो एक से अधिक विवाह का संकेत मिलता मिलता है. कारकांश से सातवें घर में बुध होने पर जीवनसाथी पढ़ा लिखा होता है. अगर चन्द्रमा कारकांस से सप्तम में हो तो विदेश में शादी की पूरी संभावना बनती है. ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-thumbnail wp-image-198" title="jaimini-jyotish-marriage" src="http://jyotirveda.com/wp-content/uploads/jaimini-jyotish-marriage-245x135.jpg" alt="" width="245" height="135" />जैमिनी ज्योतिष (Jaimini Jyotish) में विवाह के विचार के लिए उपपद को एक महत्वपूर्ण  कारक के रुप में देखा जाता है. उपपद और दाराकारक (Uppad and Dara Karak) से दूसरे एवं सातवें घर एवं उनके स्वामियों का भी विवाह के संदर्भ में विचार किया जाता है. इस विषय में कहा गया है कि अगर दूसरे घर में कोई ग्रह शुभ होकर स्थित हो व उसकी प्रधानता हो अथवा गुरु (Jupiter Karkamsa) और चन्द्रमा कारकांश  (Moon Karkamsa)  से सातवें घर में स्थित हो तो सुन्दर जीवनसाथी प्राप्त होता है. अगर दूसरे घर में कोई ग्रह अशुभ होकर स्थित हो तो एक से अधिक विवाह का संकेत मिलता मिलता है. कारकांश से सातवें घर में बुध होने पर जीवनसाथी पढ़ा लिखा होता है. अगर चन्द्रमा कारकांस से सप्तम में हो तो विदेश में शादी की पूरी संभावना बनती है.<span id="more-197"></span></p>
<p>दूसरे घर में अशुभ राशि स्थित होने पर अथवा इस पर किसी अशुभ ग्रह की दृष्टि होने पर जीवनसाथी के जीवन में जोखिम की संभावना रहती है. शनि का कारकांस  (Saturn Karkamsa)  से सातवें घर में होना यह बताता है कि जीवनसाथी की उम्र अधिक होगी. राहु कारकांस से सातवें घर में होना दर्शाता है कि व्यक्ति का सम्पर्क उनसे हो सकता है जो जीवनसाथी को खो चुके हों और पुनर्विवाह की इच्छा रखते हों. जैमिनी ज्योतिष में बताया गया है कि सूर्य अगर दूसरे घर में हो अथवा इस घर में सिंह राशि हो तो जीवनसाथी दीर्घायु होता है. इसी प्रकार दूसरे घर में आत्मकारक ग्रह हो या इस घर में बैठा ग्रह स्वराशि में हो तब भी जीवनसाथी की आयु लम्बी होती है. उपपद से दूसरे घर में बैठा ग्रह उच्च राशि में हो अथवा इस घर में मिथुन राशि हो तो एक से अधिक विवाह की संभावना रहती है. राहु एवं शनि की युति दूसरे घर में होने पर वैवाहिक जीवन में दूरियां एवं मतभेद होने की संभावना रहती है.</p>
<h2>जीवनसाथी के स्वास्थ्य का आंकलन जैमिनी ज्योतिष से ( Determination of Health of a Spouse through Jaimini Astrology)</h2>
<p>इस ज्योतिष विधि में बताया गया है कि जिस पुरूष की कुण्डली में शुक्र और केतु उपपद से दूसरे घर में स्थित हो अथवा उनके बीच दृष्टि सम्बन्ध बन रहा हो तो उनके जीवन साथी को गर्भाशय से स्म्बन्धित रोग होने की संभावना रहती है. बुध और केतु उपपद से दूसरे घर में होने पर अथवा उनके बीच दृष्टि सम्बन्ध होने पर जीवनसाथी को हड्डियों से सम्बन्धित रोग की आशंका बनती है. सूर्य, शनि और राहु उपपद से दूसरे घर में होने पर अथवा इनके बीच दृष्टि सम्बन्ध बनने पर जीवनसाथी को स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियों का सामना करना होता है. उपपद से दूसरे घर में शनि और मंगल के बीच दृष्टि सम्बन्ध होने पर तथा दूसरे घर में मिथुन, मेष, कन्या या वृश्चिक राशि होने पर जीवनसाथी को कफ से सम्बन्धित गंभीर रोग होने की संभावना होती है.</p>
<p>दूसरे घर में मंगल अथवा बुध की राशि हो और उस पर गुरू एवं शनि की दृष्टि हो तो जीवनसाथी को कान सम्बन्धी रोग होता है. इसी प्रकार दूसरे घर में मंगल अथवा बुध की राशि हो और उस पर गुरू एवं राहु की दृष्टि हो तो जीवनसाथी को दांतों में तकलीफ होती है. उपपद से दूसरे घर में कन्या या तुला राशि पर शनि और राहु की दृष्टि होने से जीवनसाथी को ड्रॉप्सी नामक रोग होने की आशंका रहती है. जैमिनी ज्योतिष में यह भी कहा गया है कि दूसरे घर में उपपद लग्न हो अथवा आत्मकारक तो वैवाहिक जीवन में मुश्किल हालातों का सामना करना होता है.</p>
<h2>स्त्री के गुणों का आंकलन नवमांश से  (Determination of Virtues of Women Through Navmansha)</h2>
<p>जिस स्त्री की नवमांस कुण्डली में बुध और लग्न से गुरू त्रिकोण में होता है वह अपने पति के प्रति समर्पित होती है तथा वैवाहिक जीवन की मर्यादाओं का पालन करती है. यह स्थिति तब भी बनती है जब शुक्र लग्न में होता है. (If the Moon is located in Taurus of the navamsa-chart and Mercury and Venus are in the 4th house from the Ascendant in navamsa the woman is well disposed and intelligent)</p>
<p>वह स्त्री बुद्धिमान एवं नम्र होती है जिनकी नवमांश कुण्डली में चन्द्रमा वृष राशि में होता है तथा बुध एवं शुक्र चौथे घर में होता है.  (If Ketu is in navamsa Ascendant or in a trine from it the woman becomes vindicate) नवमांश कुण्डली में केतु लग्न में बैठा हो अथवा त्रिकोण में तो स्त्री में नेक गुणों की कमी का संकेत मिलता है. नवमांश कुण्डली में शनि का लग्न अथवा त्रिकोण में होना भी शुभ लक्षण नहीं माना जाता है क्योंकि इससे स्त्री में सौन्दर्य एवं स्त्री जन्य गुणों की कमी पायी जाती है. नवमांश में केतु का लग्न या त्रिकोण में होना स्त्री में बदले की भावना को उजागर करता है. स्त्री की कुण्डली में लग्न स्थान पर मंगल की दृष्टि होने से स्त्री क्रोधी स्वभाव की होती है.</p>
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		<title>लाल किताब और गृहस्थ सुख (Lal kitab and the Married life)</title>
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		<pubDate>Mon, 07 Jun 2010 07:00:13 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Acharya Shashikant</dc:creator>
				<category><![CDATA[Lal kitab]]></category>
		<category><![CDATA[Marriage Astrology]]></category>
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		<description><![CDATA[गृहस्थ जीवन के सुख के विषय में लाल किताब की अपनी मान्यताएं हैं. ज्योतिष की इस विधा में वैवाहिक जीवन के सुख के विषय में कई योगों का उल्लेख किया गया है. इनके अनुसार विवाह और वैवाहिक सुख के लिए शुक्र सबसे अधिक जिम्मेवार होता है. इस विषय में लाल किताब और भी बहुत कुछ [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" rel="attachment wp-att-224" href="http://jyotirveda.com/?attachment_id=224"><img class="alignleft size-thumbnail wp-image-224" title="lalkitab-married-life" src="http://jyotirveda.com/wp-content/uploads/lalkitab-married-life-245x135.jpg" alt="" width="245" height="135" /></a>गृहस्थ जीवन के सुख के विषय में लाल  किताब की अपनी  मान्यताएं हैं. ज्योतिष की इस विधा में  वैवाहिक जीवन के  सुख के विषय  में कई योगों  का उल्लेख किया  गया है. इनके अनुसार  विवाह और वैवाहिक  सुख के लिए  शुक्र सबसे अधिक  जिम्मेवार होता है. इस विषय में लाल  किताब और भी  बहुत कुछ कहता  है.</p>
<p><strong>लाल किताब पीड़ित शुक्र ( Inauspicious Venus in Lal Kitab)</strong><br />
लाल किताब कहता है यदि शुक्र जन्म कुण्डली में सोया हुआ है तो स्त्री सुख में कमी आती है.  राहु अगर सूर्य के साथ योग बनाता है तो शुक्र मंदा हो जाता है जिसके कारण आर्थिक परेशानियों के साथ साथ स्त्री सुख भी बाधित होता है. ( In Lal Kitab, the Ascendant, fourth, seventh and tenth house are considered as a closed fist) लाल किताब में लग्न, चतुर्थ, सप्तम एवं दशम भाव को बंद मुट्ठी का घर कहा गया है. इन भाव के अतिरिक्त किसी भी अन्य भाव में शुक्र और बुध एक दूसरे के आमने सामने बैठे हों तो शुक्र पीड़ित होकर मन्दा प्रभाव देने लगता है. इस स्थिति में शुक्र यदि द्वादश भाव में होता है तो मन्दा फल नहीं देता है.<br />
कुण्डली में खाना संख्या 1 में शुक्र हो और सप्तम में राहु तो शुक्र को मंदा करता है जिसके कारण दाम्पत्य जीवन का सुख नष्ट होता है.</p>
<p>लाल किताब के टोटके के अनुसार इस स्थिति में गृहस्थ सुख हेतु घर का फर्श बनवाते समय कुछ भाग कच्चा रखना चाहिए. ( As per Lal Kitab, if any two planets are located in the sixth and eighth house from each other then there will be clashes between them in the birth-chart) लाल किताव के अनुसार ग्रह अगर एक दूसरे से छठे और आठवें घर में होते हैं तो टकराव के ग्रह बनते हैं. सूर्य और शनि कुण्डली में टकराव के ग्रह बनते हैं तब भी शुक्र मंदा फल देता है जिससे गृहस्थी का सुख प्रभावित होता है. पति पत्नी के बीच वैमनस्य और मनमुटाव रहता है.</p>
<p><strong>लाल किताब पीड़ित मंगल (Malefic Mars in Lal Kitab)</strong><br />
शुक्र के समान मंगल पीड़ित होने से भी वैवाहिक जीवन का सुख नष्ट होता है. ( If Mars is located in the 1st, 4th, 7th, 8th and 12th house then the person will suffer from Manglik Dosha.) कुण्डली में मंगल 1, 4, 7, 8 और खाना संख्या 12 में उपस्थित हो तो मंगली दोष बनाता है. इस दोष के कारण पति पत्नी में सामंजस्य की कमी रहती है. एक दूसरे से वैमनस्य रहता है. जीवनसाथी का स्वास्थ्य प्रभावित होत है.</p>
<p>लाल किताब कहता है अगर कुण्डली में मंगल दोषपूर्ण हो तो विवाह के समय घर में भूमि खोदकर उसमें तंदूर या भट्ठी नहीं लगानी चाहिए. ( The person should cast empty clay pot in the running water) इस स्थिति में व्यक्ति को मिट्टी का खाली पात्र चलते पानी मे प्रवाहित करना चाहिए. अगर आठवें खाने में मंगल पीड़ित है तो किसी विधवा स्त्री से आशीर्वाद लेना चाहिए. कन्या की कुण्डली में अष्टम भाव में मंगल है तो रोटी बनाते समय तबे पर ठंडे पानी के छींटे डालकर रोटी बनानी चाहिए.<strong></strong></p>
<p><strong>सुखयम गृहस्थी के लिए लाल किताब के टोटके ( Remedies for Pleasant Married Life)</strong><br />
लाल किताब के अनुसार जन्मपत्री में शुक्र मंदा होने पर व्यक्ति को 25 वर्ष से पूर्व विवाह नहीं करना चाहिए. ( If Venus is malefic because of Yogas of Rahu and Sun then the person should get ear piercing) सूर्य और शुक्र के योग से शुक्र मंदा होने पर व्यक्ति को कान छिदवाना चाहिए. संयम का पालन करना चाहिए. परायी स्त्रियों से सम्पर्क नहीं रखना चाहिए. दाम्पत्य जीवन में परस्पर प्रेम और सामंजस्य की कमी होने पर शुक्रवार के दिन जीवनसाथी को सुगंधित फूल देना चाहिए. (Do not place thorny flowers or planet in the house because it may affet the peace of family) कांटेदार फूलों को घर के अंदर गमले में नहीं लगाना चाहिए इससे भी पारिवारिक जीवन अशांत होता है. विवाह के पश्चात स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियां बढ़ने पर कपिला गाय के दूध का दान करना चाहिए. जीवनसाथी को सोने का कड़ा पहनाने से भी लाभ मिलता है.</p>
<p>कुण्डली में शुक्र से छठे खाने में बैठे ग्रह का उपाय करने से दाम्पत्य जीवन में खुशहाली आती है. इस उपाय से पति पत्नी के बीच वैचारिक मतभेद भी दूर होता है और आपसी सामंजस्य स्थापित होता है. ( The person should fix one silver nail each on the four stands of his bed to get happy married life.) सुखमय वैवाहिक जीवन के लिए पति पत्नी को अपने सोने की चारपायी के सभी पायों में शुक्रवार के दिन चांदी की कील ठोंकनी चाहिए. सुखमय वैवाहिक जीवन के लिए कुण्डली में अगर शुक्र के मुकाबले का कोई ग्रह बलवान है तो उसे दबाने का उपाय करना चाहिए.</p>
<p><strong>विवाह में विलम्ब सम्बन्धी टोटके (Remedies for Late Marriage)</strong><br />
विवाह में बार बार बाधाएं और रूकावट आने पर व्यक्ति को सुनसान भूमि में लकड़ी से ज़मीन खोदकर नीले रंग का फूल दबाना चाहिए. शनि के दुष्प्रभाव के कारण विवाह में विलम्ब हो रहा है तो शनिवार के दिन लकड़ी से भूमि खोदकर काला सुरमा दबाना चाहिए.</p>
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		<title>Effects of Jupiter on Career and Business</title>
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		<pubDate>Fri, 04 Jun 2010 05:25:55 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Acharya Shashikant</dc:creator>
				<category><![CDATA[Career & Money]]></category>
		<category><![CDATA[Feature]]></category>
		<category><![CDATA[Effects of Jupiter]]></category>

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		<description><![CDATA[गुरू को सत्वगुणी ग्रह माना जाता है. यह ज्ञान व भाग्य का प्राकृति स्वामी ग्रह माना जाता है. ज्योतिषशास्त्र में इसे धन का कारक भी कहा गया है. आजीविका का सम्बन्ध धन व आय से होता है. इस लिहाज से गुरू का सम्बन्ध आजीविका स्थान यानी दसवें घर से होने पर शुभ फलदायी माना जाता है. ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" rel="attachment wp-att-190" href="http://jyotirveda.com/?attachment_id=190"><img class="alignleft size-thumbnail wp-image-190" title="jupiter-and-your-career" src="http://jyotirveda.com/wp-content/uploads/jupiter-and-your-career-245x135.jpg" alt="" width="245" height="135" /></a>गुरू को सत्वगुणी ग्रह माना जाता है. यह ज्ञान व भाग्य का प्राकृति स्वामी ग्रह माना जाता है. ज्योतिषशास्त्र में इसे धन का कारक भी कहा गया है. आजीविका का सम्बन्ध धन व आय से होता है. इस लिहाज से गुरू का सम्बन्ध आजीविका स्थान यानी दसवें घर से होने पर शुभ फलदायी माना जाता है.</p>
<p><strong>गुरू से सम्बन्धित आजीविका के क्षेत्र &#8211; Careers and Business Related to Jupiter</strong><br />
गुरू ग्रह से सम्बन्धित आजीविका के क्षेत्रों में शिक्षण और शिक्षण संस्थानों से सम्बन्धित कार्यों को रखा गया है. इसका कारण यह है कि गुरू ज्ञान और विद्वता का स्वामी होता है. इनके अलावा फाईनेंस से जुड़े क्षेत्र जैसे बैंक, शेयर का काम, धन लेन-देन का काम भी गुरू के प्रभाव में आता है. आजीविका के विषय में गुरू की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि दसवें घर में अगर यह शुभ होकर बैठा है तो उच्चाधिकारी बनाता है. अगर आपकी कुण्डली में गुरू उच्च राशि में, मित्र राशि में अथवा स्वराशि में बैठा है तो आप जहां भी कार्य करेंगे अपने विभाग में उच्च पद तक जा सकते हैं. विदेशों मामलों के अधिकारी, राजदूत, वकील और जज का पेशा भी गुरू की स्थिति के अनुसार सफलता देने वाले होते हैं.</p>
<p><strong>गुरू एवं अन्य ग्रहों के सम्बन्ध से आजीविका &#8211; </strong><strong>Careers and Business</strong><strong> Related to Jupiter and other planets</strong><br />
आजीविका स्थान में गुरू के साथ अन्य ग्रह होने पर यह बात ज्यादा खुलकर सामने आती है कि आपको आजीविका हेतु किस क्षेत्र में प्रयास करना चाहिए. आपकी कुण्डली में गुरू किस ग्रह के साथ बैठा है अथवा उनका सम्बन्ध किन ग्रहों से बन रहा है इस बात को ध्यान में रखते हुए अगर अपनी आजीविका का चयन करेंगे तो संभव है कि आप जल्दी और आसानी से कामयाबी की तरफ आगे बढ़ेंगे. इस आधार पर आप देख सकते हैं कि आपकी कुण्डली में अगर-</p>
<p>गुरू व सूर्य का सम्बन्ध है तो आपको सरकारी क्षेत्र में उच्च पद प्राप्ति हेतु प्रयास करना चाहिए. अगर आप कानून विषय में शिक्षा ग्रहण करेंगे तो जज अथवा सरकारी वकील बन सकते हैं. राजदूत, जिलाधिकारी एवं सरकार से सम्बन्धित सभी उच्च पद पर आप विराजमान हो सकते हैं. राजनीति में रूचि होने पर आप मेयर, मुखिया एवं मंत्री पद के लिए चुनाव लड़ सकते हैं.</p>
<p><strong>गुरू व चन्द्र का सम्बन्ध &#8211; Relationship of Jupiter and Moon</strong><br />
दसवें घर में स्थित गुरू का सम्बन्ध अगर आजीविका स्थान से है तो व्यावसियक क्षेत्रों में आपको आपको अच्छी सफलता मिल सकती है. मिठाईयों का कारोबार एवं दूध व दूध से बने पदार्थों का कारोबार आपके लिए फायदेमंद हो सकता है. आपके लिए खेती से सम्बन्धित कार्य भी लाभकारी रह सकता है. अगर आप व्यवसाय की बजाय नौकरी करना पसंद करते हैं तो सरकारी नौकरी पाने के लिए आपको प्रयास करना चाहिए. अगर लगन पूर्वक प्रयास करेंगे तो इसमें सफलता मिलने की संभावना प्रबल रहेगी. इन दोनों ग्रहों का सम्बन्ध गीत-संगीत में भी सफलता दिलाने वाला होता है अत: आप चाहें तो संगीतकार बन सकते हैं. अगर मैरिज ब्यूरो का काम करेंगे तो उसमें भी आप सफल होंगे.</p>
<p><strong>गुरू व मंगल का सम्बन्ध &#8211; Relationship of Jupiter and Mars</strong> <strong>on your <strong>Careers and Business</strong></strong><br />
दसम भाव में गुरू व मंगल का सम्बन्ध ज्ञान के साथ ही साथ उर्जा व शक्ति भी देता है जिससे आप सेनाधिकारी बन सकते हैं. पुलिस कप्तान, रेलवे अधिकारी एवं अग्नि शमन विभाग में कार्य कर सकते हैं. धातु की मूर्तियों का काम एवं ज्वेलरी का व्यवसाय आपके लिए फायदेमंद हो सकता है.</p>
<p><strong>गुरू व बुध का सम्बन्ध &#8211; Realtionship of Jupiter and Mercury</strong> <strong>on your <strong>Careers and Business</strong></strong><br />
कुण्डली में अगर गुरू के साथ बुध का सम्बन्ध बन रहा है तो कला के किसी क्षेत्र में अपनी आजीविका की तलाश कर सकते हैं. लेखन के अलावे प्रिंटिग व प्रेस का काम को कामयाबी दिला सकता है. आप चाहें तो प्रोफेशनल फोटोग्राफर बनकर ख्याति और धन कमा सकते हैं. नौकरी के लिहाज से आपके लिए इंश्योरेंश, बैंक की नौकरी एवं अकाउंटेंट का काम उत्तम रह सकता है.</p>
<p><strong>गुरू व शुक्र का सम्बन्ध &#8211; Relationship of Jupiter And Venus</strong> <strong>on your <strong>Careers and Business</strong></strong><br />
गुरू और शुक्र यूं तो शत्रु ग्रह हैं परंतु दोनों ही नैसर्गिक शुभ ग्रह  (natural auspicious planet)  हैं. अगर दसवें घर में दोनों ग्रहों के बीच युति सम्बन्ध बन रहा हो तो कला जगत यानी फिल्म, स्टेज एवं टेलीविजन की दुनियां में नाम कमा सकते हैं. इन से सम्बन्धित क्षेत्रों में आप नौकरी भी कर सकते हैं. रेडियो जॉकी बनने हेतु भी आप कोशिश कर सकते हैं. व्यवसाय की दृष्टि से रेशमी वस्त्रों का कारोबार, फूलों का कारोबार एवं पर्फ्युम का कारोबार फायदेमंद रहेगा.</p>
<p><strong>गुरू व शनि का सम्बन्ध &#8211; Relationship of Jupiter and Saturn</strong> <strong>on your <strong>Careers and Business</strong></strong><br />
आजीविका स्थान में गुरू व शनि के मध्य सम्बन्ध होने से आजीविका की दृष्टि से खेती से जुड़ा कार्य फायदेमंद होता है. पशुपालन भी लाभदायक रहता है. किराना दुकान एवं गेहूं के व्यापार में दिनानुदिन तरक्की होती है. शिक्षण के क्षेत्र में भी आप सफल हो सकते हैं.</p>
<p><strong>गुरू व राहु का सम्बन्ध &#8211; Relationship of Jupiter and Rahu</strong> <strong>on your <strong>Careers and Business</strong></strong><br />
नवीन तकनीकों से जुड़ा कार्य एवं आटो मोबाईल का काम इन दोनों ग्रहों का दसम भाव से सम्बन्ध होने पर लाभकारी होता है. आजीविका की दृष्टि से मुद्रा परिवर्तन एवं ज्योतिषी का काम भी फायदेमंद रहता है.</p>
<p><strong>गुरू व केतु का सम्बन्ध &#8211; Relationship of Jupiter and Ketu</strong> <strong>on your <strong>Careers and Business</strong></strong><br />
कुण्डली के दसवें घर में गुरू बैठा हो और साथ में केतु भी हो तो आजीविका के तौर पर कॉस्मैटिक्स का कारोबार करना लाभप्रद होता है. दवाईयों का कारोबार एवं रसायन से सम्बन्धित काम भी उन्नति देता है. धर्मिक संस्थानों के नेता के रूप में आजीविका अच्छी रहती है. अगर आपकी कुण्डली में इन दोनों ग्रहों की युति है तो आप गुप्तचर भी बन सकते हैं.</p>
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		<title>जन्म कुण्डली और प्रश्न कुण्डली ( Birth Horoscope vs. Prashna Kundali)</title>
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		<pubDate>Thu, 03 Jun 2010 05:54:50 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Acharya Shashikant</dc:creator>
				<category><![CDATA[Horary]]></category>
		<category><![CDATA[prashna kundli]]></category>

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		<description><![CDATA[ज्योतिषशास्त्र की कई विधाएं हैं उन्हीं में से एक है जन्म पर आधारित ज्योतिष पद्धति (Birth Horoscope Astrology) और दूसरी है प्रश्न पर आधारित ज्योतिष पद्धति (Horary Astrology or Prashna Jyotish). प्रश्न ज्योतिष (Prashna Jyotish) जन्म पर आधारित ज्योतिष से कई मायने में भिन्न है. यही भिन्नता प्रश्न ज्योतिष की लोकप्रियता का कारण है. जन्म [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>ज्योतिषशास्त्र की कई विधाएं हैं उन्हीं में से एक है जन्म पर आधारित ज्योतिष पद्धति (Birth Horoscope Astrology)  और दूसरी है प्रश्न पर आधारित ज्योतिष पद्धति (Horary Astrology or Prashna Jyotish). प्रश्न ज्योतिष (Prashna Jyotish) जन्म पर आधारित ज्योतिष से कई मायने में भिन्न है. यही भिन्नता प्रश्न ज्योतिष की लोकप्रियता का कारण है.<br />
<strong>जन्म कुण्डली &#8211; Birth Horoscope or Janma Kundli</strong><br />
जन्म कुण्डली पर आधारित ज्योतिष पद्धति जन्म समय के आधार पर फलादेश करता है. इस पद्धत्ति का जन्म समय, जन्म तिथि एवं जन्म स्थान का पूरा ब्यौरा देना होता है इसके पश्चात कुण्डली का निर्माण किया जाता है. इस विधि से तैयार कुण्डली में फलादेश ज्ञात करने में काफी समय लगता है क्योकि इसमें दशा, अन्तर्दशा का सूक्ष्म विश्लेषण करना होता है जो एक लम्बी गणीतिय प्रक्रिया है.</p>
<p><strong>जन्म कुण्डली में कठिनाई</strong><br />
यह जरूरी नहीं है कि हर व्यक्ति को अपनी जन्म तिथि और जन्म समय का ज्ञान हो. अगर जन्म तिथि और जन्म समय का सही ज्ञान नहीं है तो जन्म कुण्डली से कभी भी सही फलादेश की उम्मीद नहीं की जा सकती. वहीं अगर आपको उपरोक्त तथ्यों का ज्ञान है तो जन्म कुण्डली से जीवनभर का लेखा जोखा प्राप्त किया जा सकता है. जन्म कुण्डली की गणना विधि भी थोड़ी जटिल है अत: इसका फलादेश भी विलम्ब से प्राप्त होता है. इन छोटी छोटी बातों को छोड़ दें तो जन्म कुण्डल पर आधारित ज्योतिष पद्धति सबसे प्रचलित और उत्तम माना जाता है.</p>
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<p><strong>प्रश्न कुण्डली &#8211; Prashna Kundali or Horary Astrology</strong><br />
प्रश्न कुण्डली (Horary Horoscope) को सरल तुरंत फलादेश करने वाला ज्योतिष पद्धति माना जाता है. इसका कारण यह है कि इसमें दशा अन्तर्दशा ज्ञात करने की आवश्यकता नहीं होती है. इसमें प्रश्नकर्ता जिस समय प्रश्न करता है उस समय ग्रहों के गोचर के अनुसार कुण्डली का निर्माण किया जाता है. इस कुण्डली में लग्न का निर्धारण अंकों के आधार पर किया जाता है. इस प्रक्रिया में फलादेश में गलतियां होने की संभावना नहीं रहती क्योकि इसमें वर्तमान समय में ग्रहों की स्थिति को आधार मानकर फल कथन किया जाता है.</p>
<p>प्रश्न ज्योतिष (Prashna Jyotish) में किसी खास प्रश्न का उत्तर ज्ञात करना जन्म कुण्डली पर आधारित ज्योतिषीय विधि से आसान माना गया है. इस विधि में प्रश्न कर्ता को जन्म स्थान, जन्म समय और जन्म तिथि का ब्यौरा नहीं देना पड़ता अत: जिन लोगों के पास जन्म का ब्यौरा नहीं है उनके लिए भी यह पद्धति उपयोगी है. ऐसी भी मान्यता है कि जिन लोगों को अपना जन्म समय ज्ञात नहीं है वे इस विधि से अपना जन्म समय भी ज्ञात कर सकते हैं.</p>
<p><strong>प्रश्न कुण्डली की कठिनाई</strong><br />
प्रश्न कुण्डली (Horary Horoscope)  की कठिनाई है कि इसमें एक ही प्रश्न का उत्तर कई ज्योतिषीयों से करना सही नहीं माना जाता है क्योंकि यह समय पर आधारित पद्धति है फलत: समय बदलने पर फलादेश भी बदल जाता है और मन को भ्रमित करता है. यही कारण है कि इस पद्धति से जब प्रश्न का उत्तर जानना हो तब किसी ज्ञानी ज्योतिषी से सम्पर्क करने की सलाह दी जाती है.</p>
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		<title>ज्योतिष में  ग्रहों और राशियों  की शक्ति ( The Power of Planets and Signs in Astrology)</title>
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		<pubDate>Wed, 02 Jun 2010 06:27:54 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Acharya Shashikant</dc:creator>
				<category><![CDATA[Jaimini Jyotish]]></category>
		<category><![CDATA[Jaimini astrology]]></category>

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		<description><![CDATA[ज्योतिषशास्त्र के आधार ग्रह और राशि हैं. इन्हीं की स्थितियों के आधार पर व्यक्ति विशेष के जीवन में उतार-चढ़ाव तथा यश-अपयश व सुख-दुख का विचार किया जाता है. यह सभी विषय व्यक्ति को उनकी कुण्डली में स्थिति ग्रह और राशियों की शक्ति के अनुरूप कम व ज्यादा मिलता है. इनके बीच शक्ति का आंकलन ज्योतिषशास्त्र के विशेष नियमों के आधार पर किया गया है. महर्षि जैमिनी ने अपने ज्योतिष में ग्रह व राशियों के बल को मापने के 7 आधार बताए हैं.]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>ज्योतिषशास्त्र के आधार ग्रह  और राशि हैं. इन्हीं की स्थितियों के आधार  पर व्यक्ति विशेष  के जीवन में  उतार-चढ़ाव  तथा यश-अपयश व सुख-दुख का विचार किया  जाता है. यह सभी विषय व्यक्ति को  उनकी कुण्डली में  स्थिति ग्रह और  राशियों की शक्ति  के अनुरूप कम  व ज्यादा मिलता  है. इनके  बीच शक्ति का  आंकलन ज्योतिषशास्त्र के विशेष नियमों  के आधार पर  किया गया है. महर्षि जैमिनी ने अपने ज्योतिष  में ग्रह  व राशियों के  बल को मापने  के 7 आधार  बताए हैं.</p>
<p><strong>1.आत्मकारक ग्रह (Atmakaraka Planet as per Jaimini Astrology)</strong></p>
<p>कुण्डली में आत्मकारक ग्रह को प्रमुख स्थान प्राप्त है. इसका कारण यह है कि जन्मपत्री में राशि स्वामी के बाद आत्मकारक ग्रह ही सबसे शक्तिशाली होता है. (Planet which shares maximum degrees among all the planets in the birth-chart will be the Atmakaraka planet) आत्मकारक ग्रह का दर्जा वह ग्रह पाता है जो जन्मपत्री में सबसे अधिक डिग्री पर स्थित होता है. जिस राशि में आत्मकारक ग्रह होता है वह राशि अन्य राशियों में सबसे बलशाली होती है.</p>
<p><strong>2. संगठन शक्ति द्वारा (Strength from Association</strong><strong> as per Jaimini Astrology</strong><strong>)</strong></p>
<p>जिस प्रकार सामन्य जीवन में हम देखते हैं कि जिस व्यक्ति के सम्पर्क अधिक होते हैं वह शक्तिशाली होता है, कुल मिलाकर उसी प्रकार संगठन शक्ति के द्वारा राशियों के बल का आंकलन किया जाता है.( Under this, the position and number of planets are determine to consider the powerful sign)  इसमें राशियों में मैजूद ग्रहों की संख्या, ग्रहों की स्थिति को आधार माना जाता है. इसे उदाहरण द्वारा इस प्रकार समझा जा सकता है जैसे किसी दो राशियों में से जिस राशि में ग्रह स्थित हों वह राशि बलशाली मानी जाएगी. अगर दोनों राशियों में ग्रहों की संख्या बराबर हैं तो जिस राशि में बलशाली ग्रहों की संख्या अधिक हो व बलशाली मानी जाएगी. अगर दोनों ही राशि इस आधार पर भी समान रूप से बलशाली हों तो इनके बल का विश्लेषण मित्र ग्रह की राशि और स्वगृही ग्रह के आधार पर किया जाता है. यानी ग्रहों की शुभता के आधार पर किया जाता है.</p>
<p><strong>3. स्थान के आधार पर ( Strength from Location</strong><strong> as per Jaimini Astrology</strong><strong>)</strong></p>
<p>जैमिनी ज्योतिष में राशियों की शक्ति का निर्धारण स्थान के आधार पर भी किया जाता है. इस अधार पर राशि के बल का निर्धारण का तरीका यह बताया गया है कि ( if a planet is located in its own sign then it will be a very strong planet) अगर ग्रह स्वराशि में स्थित हो तो व बलशाली होता है. लेकिन, मूल त्रिकोण में, मित्र ग्रह की राशि में या फिर उदासीन में स्थित है तो इसकी शक्ति कुछ कम होती है. अगर ग्रह अशुभ स्थान में विराजमान हो तो उसकी शक्ति क्षीण होती है. इस सिद्धांत के अनुसार जो ग्रह अपनी राशि में स्थित होता है वह उस ग्रह से अधिक बलशाली माना जाता है जो नीच राशि में स्थित होता है.</p>
<p>(As per this method, if any two signs have an equal strength then their strength will determined through its classification in Fixed, Common and Cardinal signs) इस सिद्धांत के अनुसार बल का विश्लेषण करते समय अगर दो राशियों का बल समान होता है तो इनमें शक्तिशाली राशि का आंकलन राशियों के स्वभाव यानी स्थिर, चर एवं द्विस्वभाव के आधार पर किया जाता है. इस नियम के अनुसार स्थिर राशि को चर से अधिक शक्तिशाली माना जाता है तथा द्विस्वभाव को स्थिर से बलशाली बलशाली माना जाता है. इस तरह जो ग्रह द्विस्वभाव राशि में बैठा होता है वह सभी से बल शक्तिशाली होता है.</p>
<p><strong>4. दृष्टि सम्बन्ध के आधार पर (Strength From Aspect Relationship</strong><strong> as per Jaimini Astrology</strong><strong>)</strong></p>
<p>( The sign will be strong if Mercury and Jupiter form a conjunction in it)जिस राशि में बुध और गुरु की युति बन रही हो वह राशि अत्यधिक शक्तिशाली होती है तथा जिस राशि में बुध पर गुरु अथवा गुरु की बुध पर दृष्टि पड़ रही हो वह राशि बलशाली होती है. अगर बुध और गुरु अपनी-अपनी राशि में हों तो उनकी राशि अत्यधिक शक्तिशाली हो जाती है.</p>
<p><strong>5. स्वामित्व के आधार पर ( Strength by Lordship</strong><strong> as per Jaimini Astrology</strong><strong>) </strong></p>
<p>स्वामित्व के आधार पर ग्रहों के बल का आंकलन दो तरीके से किया जाता है.</p>
<ul>
<li>अंश (Ansha)- जो ग्रह कुण्डली में सबसे अधिक अंश पर स्थित होता है वह सबसे मजबूत होता है.</li>
<li>मूल त्रिकोण (Mool-Trikona)- (Planets which are placed in the Moola-Trikona sign are stronger than other planets) जो ग्रह मूल त्रिकोण में स्थित होते हैं वह अन्य ग्रहों से अधिक बलवान होते हैं जो स्वराशि में हों, अपने मित्र ग्रह की राशि में हों, शत्रु ग्रह की राशि अथवा उदासीन घर में स्थित हों.</li>
</ul>
<p><strong>6.विषम राशि (Odd Sign</strong><strong> as per Jaimini Astrology</strong><strong>)</strong></p>
<p>विषम राशि सम राशियों के मुकाबले में अधिक शक्तिशाली होते हैं.  विषम राशि उन्हें माना जाता है जो प्रथम, तृतीय, पंचम, नवम एवं एकादश भाव में स्थित होते हैं.</p>
<p><strong>7. आत्मकारक ग्रह से स्थिति के आधार पर (Position of the Atmakaraka Planet</strong><strong> as per Jaimini Astrology</strong><strong>)</strong></p>
<p>आत्मकारक ग्रह से केन्द्र, अपोक्लिम तथा पनफरा भाव में स्थित ग्रहों की स्थिति के आधार पर भी ग्रहों की शक्ति का विवेचन किया जाता है. इस आधार पर जो ग्रह केन्द्र में होते हैं वह सबसे अधिक शक्तिशाली होते हैं. इससे कम वह ग्रह होते हैं जो अपोक्लिम में होते हैं तथा सबसे कम शक्तिशाली वह होते हैं जो पनफर में विराजमान होते हैं.</p>
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